Architectural ruins

जानसठ, मुजफ्फरनगर के सैय्यद ब्रदर्स जो मुगलों पर शासन करते थे.

जानसठ, मुजफ्फरनगर के सैय्यद ब्रदर्स जो मुगलों पर शासन करते थे. जब मुगलिया सल्तनत पर यूपी के एक कस्बे का था राज़ मुगलिया सल्तनत के बाद के दौर में दो ऐसे सेनापति हुए जो रहते तो एक कस्बे में थे, लेकिन वहीं से दिल्ली को अपने इशारों पर नचाते थे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा कस्बा है जानसठ. मुजफ्फरनगर का कस्बा. इस जगह की खासियत ये है कि इसने एक दो नहीं, बल्कि करीब 15 सालों तक ताकतवर मुगलिया सल्तनत पर राज किया. इस बड़े साम्राज्य को अपनी अंगुलियों पर नचाया. जो चाहा वो किया. इस कस्बे में दो भाई थे, जो उन दिनों इतने शक्तिशाली थे कि उन्हें किंग मेकर कहा जाता था. दिल्ली की सल्तनत पर गद्दी पर कौन बैठेगा, वो कैसे राज करेगा, ये तय करने का काम वो करते थे. उन भाइयों को सैयद भाई कहा जाता है. उनका दावा था कि वो पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा के पारिवारिक वंश से ताल्लुक रखते थे. उन भाइयों की निशानियां अब भी जानसठ और इसके आसपास फैली हुई हैं. उनके कहानी किस्से आज भी मशहूर हैं. कुछ लोग कहते हैं कि सैयद भाई अपनी जूती को दिल्ली दरबार में रखकर जानसठ से राजकाज चलाते थे. डेढ दशक तक चला सैयद भाइयों का जलवा ये सिलसिला करीब डेढ़ दशक तक चला. इसके बाद ये भाई कमजोर पड़ने लगे. उनके खिलाफ होने वाली साजिशें कामयाब होने लगीं. फिर एक दिन वो वाकई साजिश का शिकार हो गए. एक की हत्या कर दी गई तो दूसरे को जहर देकर मार दिया गया. उस जमाने में मुगलिया सल्तनत का हर छोटा बड़ा अधिकारी इन सैयद भाइयों के बुलाने पर जानसठ भागे चले आते थे. उन्हें खुश करने में लगे रहते थे. जानसठ में अब भी इन भाइयों की शानशौकत की निशानिया रंगमहल,मोती महल,शीश महल खड़े है ।ये अब भी शानदार और भव्य है. जब सैयद भाई बेगमों और दरबारियों के साथ अपनी ताकतवर सेना के साथ यहां रहते रहे होंगे तो रंगमहल की रंगीनियों की और भव्यता वाकई गजब की रही होगी. मुगल सेना की ताकतवर टुकड़ियों के सेनापति थे इन सैयद भाइयों के नाम सैयद अब्दुल्ला खान बरहा और सैयद हुसैन अली खान बरहा थे. ये दोनों मुगल सेना की उन टुकड़ियों सेनापति थे जो ना केवल सबसे बड़ी थी बल्कि शस्त्रों और लावलश्कर के लिहाज से भी विशाल थी. इन दोनों भाइयों में एक को बाद में पटना और इलाहाबाद के डिप्टी गर्वनर भी नियुक्त किया गया. तब दिल्ली सल्तनत में वो किंगमेकर बन गए थे 18वीं सदी में औरंगजेब के निधन के बाद इन भाइयों का रूतबा दिल्ली सल्तनत में बढ़ना शुरू हुआ , उथलपुथल के बीच वो किंगमेकर बन गए. मुगलिया सल्तनत के वारिसों में गद्दी पर बैठने की होड़ थी. भाई गद्दी के लिए भाई का खून बहाने का प्यासा था. साजिशों का दौर था. ऐसे में सैयद भाई जिस पर हाथ रख देते थे, वही सल्तनत का बादशाह बनकर गद्दी पर बैठ जाता था. कोई नहीं कर पाता था विरोध ये बात अलग थी कि उस दौरान उन्होंने किसी को भी दो तीन साल से ज्यादा गद्दी पर नहीं बैठने दिया. किसी की हत्या हो जाती थी या वो बीमारी से मर जाता था. अगले 13 सालों में उन्होंने छह से सात वारिसों को गद्दी पर बिठाया और उतारा. किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि उनका विरोध कर सके. क्योंकि ताकत में वो उन दिनों सबसे आगे थे. अगर कोई उनका विरोध करता तो उसे रास्ते से हटते देर नहीं लगती थी. 1719 में जब सैयद भाइयों ने मुहम्मद शाह को शासक बनवाया तो उसे भी वो अपनी कठपुतली ही बनाना चाहते थे लेकिन मुहम्मद शाह ने उनकी मनमर्जी से चलने से इनकार कर दिया. एक की हत्या हुई दूसरे को जहर दिया गया ये वो दौर भी था जब मुगलिया सल्तनत के सारे अहम फैसले जानसठ के रंगमहल में होते थे. दिल्ली का दरबार एक पैर पर इन भाइयों की सेवा में हाजिर रहता था. बाद में जब इन भाइयों से नराज दरबार के तुर्की और ईरानी धर्म गुरुओं ने बादशाह को उनके खिलाफ भड़काना शुरू किया. विरोधी एकजुट होने लगे. नतीजतन सैयद खुद साजिश का शिकार हो गए. एक भाई की 1720 में हत्या हो गई. इसके दो साल के भीतर दूसरे भाई को जहर दे दिया गया. निशानियां आज भी बिखरी हुई हैं जानसठ में आज भी इन दोनों भाइयों की तमाम निशानियां मौजूद हैं, जो उनके भव्य अतीत और वैभव की कहानियां कहती हैं. हैरान भी करती हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इतना छोटा सा कस्बा कैसे एक जमाने में इतनी महत्वपूर्ण जगह बन गया था.

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