Architectural ruins

Asaura Mahal,Hapur

असौड़ा महल,हापुड़ यह महल प्रतीक है त्यागी समाज की शान चौधरी देवी सिंह जी व उनके दो पुत्रों श्री रघुवीर नारायण सिंह त्यागी जी और लक्ष्मी नारायण सिंह त्यागी जी का । रघुवीर नारायण सिंह त्यागी के एक बेटे थे श्री रघुवंश नारायण सिंह त्यागी जी और उनके चार बेटे थे १-सुख वंश नारायण सिंह त्यागी जी उनके भी तीन पुत्र हुए १)जय वंश नारायण सिंह त्यागी,२)विनय वंश नारायण सिंह त्यागी ,३)अजय वंश नारायण सिंह त्यागी जी २-मुख वंश नारायण सिंह त्यागी जी ३-उदय वंश नारायण सिंह त्यागी जी ४-यदु वंश नारायण सिंह त्यागी जी उनकी बेटी चित्रा त्यागी जी हैं । आपके दादा राजा श्री हरदयाल सिंह जी ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में आखिरी शहंशाह बहादुर शाह ज़फर को काफ़ी धन दिया जिस की वजह से आज़ादी का पहला ग़दर लड़ा गयाl भारत के पहले राष्ट्रपति के लिए चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी जी महात्मा गांधी की पहली पसंद थे लेकिन रघुवीर जी ने इनकार कर दिया । चौधरी चरण सिंह जी जो भारत के प्रधान मंत्री रहे हैं वो कभी इस परिवार के एक किरायेदार के रूप में रहे है । 1928 में महात्मा गांधी असौड़ा आये थे जिन्होंने असौड़ा महल में बैठकर मीटिंग भी की थी. * यही वो महल है जिसमे महात्मा गांधी ने मीटिंग की थी और जनपद मेरठ में विदेशी कपड़ो की होली जलाने पर असौड़ा के चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराकर जेल भी भेजा गया था. * हापुड़ जिले का असौड़ा गांव सबसे बड़ा गांव है * रघुवीर नारायण सिंह के पिता चौधरी देवी सिंह जी यूपी में बड़े जमीदारों में माने जाते थे, और अंग्रेजो ने उन्हें राय बहादुर की उपाधि प्रदान की थी. * आज भी असौड़ा गांव का महल असौड़ा महल के नाम से काफी प्रसिद्ध है लेकिन रियासत के स्वामी रहे परिवार के सदस्य अलग अलग जगह जाकर रह रहे है । महात्मा गांधी के लिये असहयोग आंदोलन की शुरुआत असौड़ा गांव से शुरू हुई थी. * उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन’ के लिए आये थे गांधी जी. * अंग्रेजो के भारत छोड़ने को लेकर महात्मा गांधी ने शुरु किया था आंदोलन. 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन Quit India Movement का मेरठ से अगुवाई करने वाले थे असौड़ा रियासत के चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी जी चौ. रघुवीर नारायण सिंह त्यागी ने मेरठ में कांग्रेस अधिवेशन 1946’ आयोजित करवाया जिसकी उन्होंने अध्यक्षता भी की थी। उन्होंने अपना बहुत कुछ धन यश कीर्ति देश के लिए समर्पित करके राष्ट्र आंदोलन में आगे बढ़कर काम किया। उनके चाचा ने भी कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। बात 29 अक्टूबर 1929 की है, महात्मा गांधी पहली बार हापुड़ जिले के गांव असौड़ा आए थे। और चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी के महल में रात्रि विश्राम किया था। जब अगले दिन सुबह में गांधी महल के बाहर बने मंदिर की ओर टहल रहे थे तभी वहां सफाई कर्मचारी झाड़ू लगा रहा था। उन्होंने सफाई कर्मी से पूछा कि तुम झाड़ू कहां तक लगाते हो? तब उसने कहा कि मंदिर के अंदर भी मैं ही झड़ू लगाता हूं। यह सुनकर महात्मा गांधी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने इस बात का जिक्र अपने अखबार नवजीवन, यंग इंडिया और हरिजन में भी किया। उन्होंने अखबार में लिखा कि 'असहयोग के जमाने में भी तथाकथित अस्पृश्यों के लिए भी मंदिर के दरवाजे खुले हैं। यह जमींदारी में एक अनुकरणीय दृष्टांत है भारत में हजारों जमींदारियों में हजारों मंदिर हैं। जमींदारों को अपने मंदिरों में अस्पृश्यों के लिए खोलने से कोई नहीं रोक सकता। अन्य तरीकों से भी अस्पृश्यों से स्नेह भाव बढ़ा सकते हैं। जैसे चौधरी साहब ने किया है। ...जब गांधी ने कहा अंग्रेजों की तरह हमारे पास भी एक राजा गांधी जी ने इस बात का जिक्र कई सभाओं में भी किया था। महात्मा गांधी दो बार असौड़ा गांव पधारे हैं। दूसरी बार वह वर्ष 1930 में असौड़ा रियासत में आए थे। इस दौरान वह कुछ देर ही चौधरी रघुवीर नारायण सिंह के पास रुके थे। महात्मा गांधी चौधरी रघुवीर नारायण सिंह का अपना मित्र मानते थे। महात्मा गांधी ने मुंबई की एक सभा में कहा था कि 'यदि अंग्रेजों के पास तमाम राजा हैं, तो हमारे पास भी एक राजा है चौधरी रघुवीर नारायण सिंह।' जब भी गांधी जी मेरठ के आस-पास कहीं भी आते थे, तो सुखवंश नारायण सिंह जी स्वयं अपनी कार में बैठाकर गांधी जी को सभी जगह लेकर जाते थे। अक्सर ऐसा होता था कि गांधी जी कार की पिछली सीट पर बैठते थे और कुछ देर बाद ही खर्राटे मारने लगते थे। जब मै उन्हें सोते हुए देखता था, तो गाड़ी की रफ्तार धीरे कर लेता था। ताकि उनकी नींद में खलल न पड़े। होता यह था कि जगह-जगह गांधी जी की सभाएं होती थीं और उन्हें आराम के लिए बहुत कम समय मिलता था, तो वह कार में ही आराम कर लिया करते थे। मेरठ गांधी आश्रम,एवम् त्यागी हॉस्टल श्री त्यागी जी के समाज और देश के प्रति समर्पण की भावना से उनके द्वारा प्रदत्त की गई इमारतें हैं। उन्होंने मेरठ खादी को प्रमुखता देने के लिहाज से गढ़ रोड स्थित ‘गांधी आश्रम’ की जमीन खरीदी जिसे उन्होंने डोनेशन के तौर पर दे दिया था। देश के हित में सेवा कार्यों के दौरान रघुवीर नारायण सिंह त्यागी जी ( जन्म 23 मई 1872 ) का नौ जुलाई 1969 को निधन हो गया । सन् १९३२ के आसपास त्यागी जी ने मेरठ कचहरी रोड स्थित बेगम समरू की जयदाद अंग्रेज़ी हकूमत से नीलामी में ख़रीदी और आज वह असोडा हाउस के नाम से जाना जाता है , मेरे दादाजी ( स्वर्गीय श्री हंस कुमार जी सर्राफ़ ) बचपन में प्रायः मुझे बताते थे की कैसे वे श्री उदय वंश एवं श्री यदु वंश नारायण जी के साथ मेरठ कॉलेज के जलसों में हाथी पर जाया करते थे । वे बताते थे की हीरे की गोल किनकियो को कंचे की जगह उपयोग में लाया जाता था खेलने के लिये।इन तीनो मित्रों को मेरठ कॉलेज में धूम्रपान करने का चस्का लग गया और एक गोरे अफ़सर से ये चोरी चोरी सिगरिट ख़रीदने लगे ( rothmans brand) जब दोनो और के बुज़ुर्गों को पता चला तो ख़ूब डाँट पड़ी और बेचारे अंग्रेज़ अफ़सर को ज़िला बद्र होना पड़ा ।आदरणीय यदुवंश नारायण त्यागी जी को मैं व्यक्तिगत रूप से बचपन से मेरे बड़े भाई अखिल जैन के साथ मिलता रहा हूँ सरल एवं सहज व्यक्तित्व के धनी प्रिय “बाबाजी” ( वो हमारे दादा स्वर्गीय हंस कुमार जैन जी के परम मित्र थे ) से मिलकर हम अभिभूत हो जाते थे , उनका परस्पर स्नेह , वात्सल्य और लगाव भुलाए नही भूलता । आज भी उनकी सुपुत्री चित्रा जी जिनको हम बुआजी मानते है का प्यार और आशीर्वाद हमें मिलता रहता है , श्री अजय वंश नारायण जी एवं चित्रा बुआजी असौड़ा में रहकर ही परिवार की यादों को संजोये हैं । —————????————— परिवार को समर्पित हैं ये पंक्तिया : “आज गुमनाम हूँ तो फ़ासला रख, कल फिर मशहूर हो जाऊँ तो कोई रिश्ता निकाल लेना मुझसे “” Chitra Tyagi Avn Singh



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